हम गाँधी और भगत सिंह को पढ़ते हुए बड़े हुए थे, लेकिन हमारा जीवन भगत सिंह से प्रभावित था, हम भी शहीदे आज़म की तरह ही कुछ करना चाहते थे, मगर इसे बदकिस्मती कहिये या फिर कुछ और. हम आज़ाद भारत में पैदा हुए थे, और यहाँ हमें भगत सिंह बनने मौका आसानी से नहीं मिलेगा, ये बात उस दिन हमारी समझ में आई जिस दिन हमने पहली बार कानून को अपने हाथ में लिया था, साला सारा मोहल्ला आज का भगत सिंह जिंदाबाद नारा लगाने के बजाय हमारे नाम का पान खाकर थूक रहा था, भविष्य के भगत सिंह की इतनी बेईज्ज़ती देखकर हम समझ गए की यहाँ सब लाठी वाले बाबा के भक्त हैं.
खैर फिर शुरू हुई हमारी रोमांटिक लाइफ, हमने प्यार भी किया तो एक ऐसी लड़की के साथ जिसका बाप और भाई हमसे बहुत नफरत करते थे, उनके इसी नफरत में हमें भगत सिंह बनने की उम्मीद दिखाई देने लगी, देश के लिए न सही, अपने प्यार के लिए हम भगत सिंह बनने को तैयार थे. फिर क्या उसके नाम का चौला अपने सर बांधकर और दिल में सरफरोशी की तमन्ना लिए हम घर से निकल लिए, महोब्बत के देवता के मंदिर में माथा टेका, इश्क वाला तिलक लगाया, और बन्दूक की नौक पर मंदिर के पुजारी से आधा तौला सोना उधार माँगा, मंगलसूत्र के लिए। जब उसके घर के सामने पहुंचे, उसका बाप और भाई दोनों घर की पहरेदारी कर रहे थे, क्या सीन था बाय गॉड, उसका बाप एकदम जनरल डायर और भाई सांडर्स की तरह लग रहा था, और हम एकदम भगत सिंह, बस थोड़ी सी गड़बड़ हो गयी जो हमारे पिताजी बापू बनकर वहां पहुँच गये. अपने आदर्शों की खातिर वो हमारी क़ुरबानी देने को तैयार थे, हमको अपनी क़ुरबानी देने का डर नहीं था, डर था तो बस इस बात का की आज भी भगत सिंह, बापू से हार जायेगा, इसके आगे हम जो भी किये, बस यूँ समझ लीजिये की इतिहास बदल दिए।
No comments:
Post a Comment