Wednesday, October 9, 2013

itihas hamesha khud ko nahi dohrata...

हम गाँधी और भगत सिंह को पढ़ते हुए बड़े हुए थे, लेकिन हमारा जीवन भगत सिंह से प्रभावित था, हम भी शहीदे आज़म की तरह ही कुछ करना चाहते थे, मगर इसे बदकिस्मती कहिये या फिर कुछ और. हम आज़ाद भारत में पैदा हुए थे, और यहाँ हमें भगत सिंह बनने मौका आसानी से नहीं मिलेगा, ये बात उस दिन हमारी समझ में आई जिस दिन हमने पहली बार कानून को अपने हाथ में लिया था, साला सारा मोहल्ला आज का भगत सिंह जिंदाबाद नारा लगाने के बजाय हमारे नाम का पान खाकर थूक रहा था, भविष्य के भगत सिंह की इतनी बेईज्ज़ती देखकर हम समझ गए की यहाँ सब लाठी वाले बाबा के भक्त हैं. 
खैर फिर शुरू हुई हमारी रोमांटिक लाइफ, हमने प्यार भी किया तो एक ऐसी लड़की के साथ जिसका बाप और भाई हमसे बहुत नफरत करते थे, उनके इसी नफरत में हमें भगत सिंह बनने की उम्मीद दिखाई देने लगी, देश के लिए न सही, अपने प्यार के लिए हम भगत सिंह बनने को तैयार थे. फिर क्या उसके नाम का चौला अपने सर बांधकर और दिल में सरफरोशी की तमन्ना लिए हम घर से निकल लिए, महोब्बत के देवता के मंदिर में माथा टेका, इश्क वाला तिलक लगाया, और बन्दूक की नौक पर मंदिर के पुजारी से आधा तौला सोना उधार माँगा, मंगलसूत्र के लिए। जब उसके घर के सामने पहुंचे, उसका बाप और भाई दोनों घर की पहरेदारी कर रहे थे, क्या सीन था बाय गॉड, उसका बाप एकदम जनरल डायर और भाई सांडर्स की तरह लग रहा था, और हम एकदम भगत सिंह, बस थोड़ी सी गड़बड़ हो गयी जो हमारे पिताजी बापू बनकर वहां पहुँच गये. अपने आदर्शों की खातिर वो हमारी क़ुरबानी देने को तैयार थे, हमको अपनी क़ुरबानी देने का डर नहीं था, डर था तो बस इस बात का की आज भी भगत सिंह, बापू से हार जायेगा, इसके आगे हम जो भी किये, बस यूँ समझ लीजिये की इतिहास बदल दिए।

ये रामलीला नहीं रमलीला थी....

एक  बार  हमको गाँव की रामलीला में सोभाग्य से राम का किरदार निभाने का मौका मिला। हालाँकि बचपन से ही हमारा सपना था की जब हम बड़े हो जायेंगे तो रावण का किरदार निभायेंगे . जिसके लिए हम हर साल रामलीला के दौरान स्टेज के पीछे जाकर खूब अभ्यास करते थे, भारत की राजधानी का नाम मालूम नहीं था लेकिन रावण के संवाद मुह ज़ुबानी याद थे, "उठो भ्राता कुम्भकर्ण अभी सोने का समय नहीं"  " हम हैं लंकेश और ये हमारी लंका, तीनो लोकों में बजता है हमारे नाम का डंका" . 

लेकिन किस्मत ने हमारे सर पर ऐसा हथौड़ा मारा कि साला हम पांच फुट पांच इंच के आगे बढ़ ही नहीं पाए। फिर भी हमने पूरी कोशिश की, तालीम मास्टर को पटाने की, यहाँ तक की रामायण का हवाला भी दिया और कहा की मास्टरजी पूरी रामायण में कहीं भी रावण की कद काठी का ज़िक्र नहीं है,  मगर उनको तो साला छे फुटिया रावण चाहिए था, सो हम रिजेक्ट हो गए।  गुस्से से आगबबुला  हो गए, दिल में ख़याल आया की साला बजरंगबली बनकर पूरी रामलीला स्टेज का ही दहन कर दें। इससे पहले की हम कुछ करते, सनी देओल की फिल्म का संवाद याद आ गया "काशी बेटा क्रोध को पालना सीख" बस इसी बात ने हमें रोक लिया . 

खैर मास्टरजी भले ही हमारी कद काठी से प्रभावित ना हुए हों, मगर हमारी अभिनय प्रतिभा के दीवाने तो वो भी थे।  उन्होंने मुझे राम का किरदार निभाने के लिए कहा।  ये सुनते ही मेरे पैरों तले ज़मीन खसक गयी, ऐसा लगा जैसे मास्टर ने मेरे दिमाग का दहन कर दिया हो। किसी तरह खुद को संभाला और बोले, मास्टरजी रावण का किरदार किसी और से करवाना चाहते हैं तो बेशक करवाइए, मगर राम का किरदार हमसे करवाकर, हमें पाप का भागी ना बनाइए।  अरे जिस रावण को हम बचपन से अपना आदर्श मानते आये हैं, आप हमें राम बनाकर हमारे हाथो ही उनकी हत्या करवाना चाहते हैं, ये हमसे ना हो पायेगा मास्टरजी।  

बस मास्टरजी पगला गए, क्रोध को शांत करने के लिए राम नाम का जाप करने लगे. शाम को बात करेंगे, इतना बोलकर वहां से कट लिए। 

शाम को जब हम मास्टरजी से मिलने पहुंचे तो टेबल पर दो कांच की गिलास , एक प्लेट चकना और साथ में रम का अद्धा देखकर हम समझ गए की मास्टरजी का गुस्सा ठंडा हो गया है, फिर वो हमें रम पिलाकर राम के चरित्र का वर्णनं करने लगे।  वो जानते थे की दारू पीकर किया गया वादा हम कभी नहीं तोड़ते थे, इसी बात का उन्होंने फायदा उठाया और इस रावण भक्त को राम का किरदार निभाने के लिए राजी कर लिया।  एक बात हम रावण की सौगंध खाकर कह सकते है कि हमेशा सियाराम्चंद्र की जय बोलने वाले मास्टरजी उस वक़्त रमचन्द्र की जय बडबडा रहे थे।

ज़बान दे चुके थे सो हम भी राम का किरदार निभाने की तैयारी में जुट गए, हमारे इस फैसले से एक इंसान को छोड़कर बाकि सब बड़े खुश थे, वो इंसान खुद हम थे। खैर इसी बीच रामलीला आयोजन की सारी  तैयारियां पूरी हो चुकी थी, पहाड़ के गांवों में रामलीला का आयोजन दशहरे से शुरू होकर नवम्बर लास्ट तक चलता  रहता है. हर गाँव अपनी सुविधा के अनुसार रामलीला का आयोजन करता है, इस बात का पूरा ध्यान रखा जाता है, जब एक गाँव में रामलीला चल रही हो तो आस पास के किसी दुसरे गाँव में रामलीला  का आयोजन न किया जाये।  ऐसा करने से भीड़ और चन्दा बँटने का खतरा नहीं रहता है।  हमारे गाँव के नसीब में नवम्बर माह के आखिरी दस दिन रामलीला आयोजन के लिए लिखे गए थे, हाड कंपा देने वाली ठण्ड में किसी की मजाल जो  बिना रम का सहारा लिए स्टेज पर उतर जाये।  खैर ये सब परदे के पीछे की बातें हैं, इन्हें बेपर्दा करना अच्छा नहीं।  

रामलीला शुरू हो गयी थी, हमारा राम अवतार लोगों को खूब भा रहा था, छठवें दिन तक हमारे खाते में तीन हज़ार दो सौ पांच रुपये जमा हो चुके थे, छोटे गाँव में ये रकम बहुत होती है. यहाँ तक तो सब ठीक ठाक चल रहा था, बस यहाँ से आगे जो हुआ वो नहीं होना चाहिए था।  

रामलीला का छठवां दिन था स्टेज पर लक्ष्मण और शूर्पनखा वाला सीन चल रहा था।  स्टेज के पीछे हम यानि राम और छे फुटिया रावण दोनों रम के जाम छलका रहे थे, बाकि दिन तीन पहाड़ी पेग (एक ही घूँट में पूरी गिलास गटक जाना) मारते थे, उस दिन छे मार  लिए।  तीन एक्स्ट्रा रावण का किरदार ना मिलने के गम में। ईमानदारी से कहें तो हमको चढ़ गयी थी, इससे पहले की हम कुछ कर पाते, मास्टरजी का बुलावा आ गया।  लक्ष्मण शूर्पनखा की नाक हलाल कर चूका था, अब हमारी इंट्री थी।  लड़खड़ाते हुए  हम जैसे तैसे स्टेज पर संतुलन बनाकर एक जगह पर चुपचाप खड़े हो गए और लक्ष्मण की शकल देख कर धीरे धीरे मुस्कुरा दिए, लक्ष्मण ने फुसफुसाकर कहा की अपना डायलॉग तो बोलो।  कुछ याद आये तो बोलें, साला हमारे दिमाग पर तो दारू का दबदबा हो चूका था।  मास्टरजी ने परदे के पीछे से हेल्प करने की कोशिश की, मगर राम पे तो रम का जादू छाया हुआ था, सो आज मास्टरजी जी की रामलीला नहीं हमारी रमलीला चलने वाली थी।

हे भ्राता लक्ष्मण! तुम्हारे बाण पर ये रक्त कैसा, लगता है तुमने किसी निरीह प्राणी का वध किया है।  हमारा ये संवाद सुनकर मास्टरजी और लक्ष्मण दोनों की दिमाग की बत्ती कुछ पल के लिए गुल हो गयी थी, लेकिन दर्शकों की तालियों की गडगडाहट सुनकर मास्टरजी ने लक्ष्मण को सीन सँभालने का इशारा किया।

नहीं भ्राता श्री ये रक्त किसी निरीह प्राणी का नहीं, शूर्पनखा का है, लक्ष्मण ने  उत्तर दिया।

कहीं ये वही शूर्पनखा तो नहीं जो रावण की बहिन है और हमसे विवाह करना चाहती थी,  हमने पूछा .

हाँ भ्राता श्री ये वही है, लक्ष्मण ने उत्तर दिया 

अरे  मुर्ख तुमने एक स्त्री का वध किया है, हम तुम्हें कभी क्षमा नहीं करेंगे।

लक्ष्मण - वध नहीं किया है सिर्फ नाक काटी है, क्योंकि वो सीता भाभी का अपमान कर रही थी। और भाभी के मान की रक्षा करके मैंने अपना धर्म निभाया है. 

अरे मुर्ख एक स्त्री के मान के लिए दूसरी स्त्री का अपमान करना धर्म नहीं होता . इससे तो अच्छा होता की तुम शूर्पनखा से कहते की मेरे भ्राता श्री रामचंद्र वन वोमेन मेन हैं, वो सीता से बेहद प्रेम करते हैं और तुम्हें कभी अपनी पत्नी के रूप में कभी स्वीकार नहीं करेंगे। मगर तुमने शूर्पनखा का अपमान करके, सीता का अपमान किया है, क्योंकि अब उसका भाई रावण आएगा और सीता हरण करके हमसे प्रतिशोध लेगा .
ये राम नहीं रम बोल रम था, लक्ष्मण की जुबान पे ताला लग चूका था, मास्टरजी परदे के पीछे अपनी लुटी हुई इज्ज़त का मातम मना रहे थे, लेकिन दर्शक खूब मजा ले रहे थे,  तभी सोने पे सुहागा हो गया, जब रावण बिन बुलाये मेहमान की तरह लडखडाते हुए स्टेज पर आ धमका, उसकी चाल देखकर ही हम समझ गए की आज ये भी रम लीला करेगा, वो सीधे लक्ष्मण के पास गया और उसका गला पकड़  कर बोला,
तो तू ही है वो धूर्त जिसने मेरी प्यारी बहिन का नाक काटा, हम तुम्हारे प्राण हर लेंगे, 

फिर वो मेरे पास आया और बोला, हे राम मैंने परदे के पीछे से सब सुन लिया, जिस प्रकार तुम अपने भाई को फटकार लगा रहे थे, अगर ऐसी ही फटकार त्रेता युग में भगवान् श्री राम ने लक्ष्मण को लगायी होती तो सीता का अपहरण नहीं होता, हम मन ही मन सोचने लगे की रावण की बात में दम है।  परन्तु यदि तुम चाहो तो इतिहास दोहराने से बच  सकते हो।

कैसे? हे लंका नरेश कृपया मार्गदर्शन करें, मैंने दोनों हाथ जोड़कर कहा. 

रावण बोला- अगर तुम अभी इसी वक़्त अपने हाथों से अपने भाई को उसके किये की सजा दोगे तो मैं लंका नरेश रावण भरी सभा में पूरे गाँव वालों के सम्मुख  ये प्रतिज्ञा लेता हूँ की सीता का हरण केंसिल,

हम सोच में पड़  गए, मगर रम का असर पूरा काम कर रहा था, सीता का अपहरण नहीं होगा, तो हमें रावण से युद्ध नहीं करना पड़ेगा और हम ब्राह्मण हत्या के पाप से बच जायेंगे, बस और हमको क्या चाहिए था, आव  देखा ना ताव आगे बड़े और लक्ष्मण के कान के निचे जितनी जोर से बजा सकते थे, उतनी जोर से बजा दिया।
हमारे थप्पड़ गूँज से वहां मौजूद सभी लोग सन्न रह गए, सिवाय दो जनों को छोड़कर, एक हम और दूसरा रावण।  हम दोनों ऐसे सेलिब्रेट कर रहे थे जैसे इंडिया ने फूटबाल वर्ल्ड कप जीत लिया हो।  वो हमारी लाइफ का आखिरी जश्न था।  रावण को गुस्साई भीड़ ने मार डाला, और हम मास्टरजी की कृपा से वहां से भागने में तो सफल  रहे मगर आज तक हमारा वनवास ख़त्म नहीं हुआ......