Saturday, January 17, 2009

शायरी

यही अंदाज है मेरा समंदर फतह करने का ,
मेरी कागज की किश्ती में जुगनू भी होते है !

अगर गिरना ही था तो ढूढ़ते सौ-सौ मुकाम,
ऐसा भी क्या गिरे की निगाहों से उतर गए!

आबरू तो उनकी भी लुटी थी ,
फर्क सिर्फ़ इतना था की उनको देखने वाले सभी अंधे थे!

न पूछो मुझसे की मेरी मंजिल है कहाँ ,अभी तो मैंने सफर का इरादा किया है,
ऐसा मैंने किसी से नही बल्कि अपनेआप से वादा किया है!

6 comments:

संगीता पुरी said...

बहुत सुंदर...आपके इस सुंदर से चिटठे के साथ आपका ब्‍लाग जगत में स्‍वागत है.....आशा है , आप अपनी प्रतिभा से हिन्‍दी चिटठा जगत को समृद्ध करने और हिन्‍दी पाठको को ज्ञान बांटने के साथ साथ खुद भी सफलता प्राप्‍त करेंगे .....हमारी शुभकामनाएं आपके साथ हैं।

ज्योत्स्ना पाण्डेय said...

हिंदी ब्लॉगजगत में आपका हार्दिक स्वागत है .
आपकी लेखनी सदैव गतिमान रहे .....

मेरी शुभकामनाएं ......

अभिषेक मिश्र said...

न पूछो मुझसे की मेरी मंजिल है कहाँ ,अभी तो मैंने सफर का इरादा किया है,
ऐसा मैंने किसी से नही बल्कि अपनेआप से वादा किया है!
Acchi lagi kavita aapki. Swagat.

(gandhivichar.blogspot.com)

Journalist said...

बहुत अच्छा! सुंदर लेखन के साथ चिट्ठों की दुनिया में स्वागत है। चिट्ठाजगत से जुडऩे के बाद मैंने खुद को हमेशा खुद को जिज्ञासु पाया। चिट्ठा के उन दोस्तों से मिलने की तलब, जो अपने लेखन से रू-ब-रू होने का मौका दे रहे हैं एक तलब का एहसास हुआ। आप भी इस विशाल सागर शब्दों के खूब गोते लगाएं। मिलते रहेंगे। शुभकामनाएं।

Prakash Badal said...
This comment has been removed by the author.
Prakash Badal said...

अच्छी कोशिश। आगे बढ़ें हम आपके साथ हैँ